पर्यूषण पर्व में महावीर जन्मोत्सव मनाया, निकला वरघोड़ा

आशुतोष पंचोली
आलीराजपुर। ब्यूरो
सोमवार शाम को शहर का मुख्य मार्ग केशर की खुशबू से उस वक्त महक उठा जब वरघोडे में केशर के छापे लगाकर जैन समाजजन भगवान महावीर के जन्म वाचन के बाद राजेंद्र उपाश्रय से निकले। वातावरण में हर और केशर की महक घुल गई। इससे पहले राजेंद्र उपाश्रय में साध्वी शासनलता श्रीजी आदि ठाणा चार ने कहा कि भगवान महावीर ने आत्मिक और शाश्वत सुख की प्राप्ति के लिए पांच सिद्धांत हमें बताए। सत्य,अहिंसा, अपरिग्रह, अचौर्य और ब्रह्मचर्य। वर्तमान में वर्तमान अशांत, आतंकी, भ्रष्ट और हिंसक वातावरण में महावीर की अहिंसा ही शांति प्रदान कर सकती है। महावीर की अहिंसा केवल सीधे वध को ही हिंसा नहीं मानती है,अपितु मन में किसी के प्रति बुरा विचार भी हिंसा है। जब मानव का मन ही साफ हीं नहीं होगा तो अहिंसा को स्थान ही कहाँ?

जन्म की घोषणा होते ही छाया उत्साह
पर्वाधिराज पयुर्षण पर्व के पाचवें दिन जैसे ही उपाश्रय में शाम करीब 5 बजे साध्वीजी ने कल्पसूत्र के वाचन के दौरान भगवान महावीर के जन्म उत्सव का वाचन कर भगवान के जन्म होने की घोषणा की वैसे ही राजेंद्र उपाश्रय त्रिशला नंदन वीर की जय बोलो महावीर की के जयकारों से गुंज उठा और बाहर ढोल नगाड़े बज उठे। उत्साह का वातारवण छा गया। जन्म वाचन के बाद वरघोड़े (शोभायात्रा) का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में समाजजनों ने सहभागिता की। वरघोड़े के समापन के पश्चात श्रीसंघ की और श्रीहेमेंद्रसुरी भवन में स्वामी वात्सल्य का आयोजन भी किया गया।
सुमेरु पर्वत पर इंद्र और देवों ने प्रभु का जन्म कल्याणक मनाया
साध्वीजी ने बताया कि भगवान के जन्म के पहले उनकी माता त्रिशला ने 14स्वप देखे थे। अवसर्पिणी काल के अंतिम तीर्थंकर श्री महावीर स्वामी का जन्म हुआ। बिहार प्रान्त के वैशाली गणराज्य के क्षत्रिय कुण्ड ग्राम के राजा सिद्धार्थ की रानी त्रिशलादेवी की रत्नकुक्षी (कोख) से चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को मध्यरात्रि में प्रभु का जन्म हुआ। प्रभु के जन्म से त्रिलोकों में आनन्दोत्सव छा गया। शिशु तीर्थंकर को सुमेरु पर्वत पर ले जाकर इंद्रो और देवों ने प्रभु का जन्म कल्याणक मनाया। श्रेष्ठ कर्म करने वाला शुद्रकुलोत्पन्न व्यक्ति भी ब्राह्मण हैं
साध्वी जी ने बताया कि भगवान महावीर का साधना काल बारह वर्ष छह महीने और पन्द्रह दिन का रहा। इस अवधि में भगवान ने तप,संयम और साम्यभाव की विलक्षण साधना की। शुलपाणि, कटपुतना, संगम आदि देवों, चण्डकौशिक आदि तिर्यंचों, अनार्यों तथा ग्वालों आदि मानवों ने प्रभु को लोमहर्षक उपसर्ग दिए। प्रभु के कानों मे कीले तक ठोक दिए गए। परन्तु कष्ट दाताओ को भी प्रभु ने अपना हितैषी ही माना। समय मात्र के लिए भी प्रभु के ह्रदय मे कष्ट देने वालो के प्रति अन्यथा भाव का उदय नही हुआ। प्रभु की धर्मक्रान्ति से राजा से लेकर रंक तक प्रभावित हुए। पशुबलि और अस्पर्शयता का प्रबल विरोध किया। उन्होनें कहा मनुष्य जन्म से नहीं कर्म से महान बनता हैं। श्रेष्ठ कर्म करने वाला शुद्रकुलोत्पन्न व्यक्ति भी ब्राह्मण हैं।
स्वप्नों की बोलिया लगी
श्रीसंघ के पदाधिकारियों ने बताया कि महावीर जन्म वाचन के पूर्व माता त्रिशला द्वारा भगवान के जन्म से पूर्व देखे गए 14 स्वप्नों हाथी,वृषभ, सिंह, लक्ष्मी, फुलनी माला, चंद्रमा, सूर्य, ध्वजा,कुंभ (कलश), पद्य सरोवर,क्षीर समुद्र, देव विमान, रत्नो ढगलो, निर्धुम अग्री की बोलियां लगाई गई, जिसमें समाजजनों ने उत्साह पूर्वक सहभागिता की। इसके बाद भगवान को पालने में झूलाया गया। इस दौरान समाजजनों को केसर के छापे लगाए गए। वरघोडे में भगवान की माता द्वारा देख गए स्वप्रों को महिलाएं व बालिका अपने सिर पर धारण कर चल रही थी।

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