जंगलों में लगी आग से जनता में बेचैनी, वन अमले के पास आग बुझाने के संसाधनों की कमी

ग्रामीणों की अज्ञानता व शरारती तत्वों से हो रही बेशकीमती जंगलों की क्षति

कट्ठीवाड़ा से प्रेम गुप्ता की रिपोर्ट।

खुली व बेशकीमती हरीभरी प्राकृतिक वन संपदा से भरे कट्ठीवाड़ा क्षेत्र में गत तीन दिनों से जंगलों में लगी हुई आग से जनता में बेचैनी फैली हुई है। ये आग का दावानल हरे भरे पेड़ों को जलाने के साथ ही नवांकुरित पौध को भी झुलसाकर खत्म कर देती है। आग बुझाने के लिए  स्थानीय वनकर्मियों के पास हौंसला तो है किंतु साधनों के अभाव में आग बुझाने की उनकी कोशिशों पर ही पानी फिर जाता है। स्थानीय ग्रामजनों की अज्ञानता व  शरारती तत्त्वों  के कारण क्षेत्र की समृद्ध वन विरासत को गंभीर क्षति पहुँच रही है।  


प्रति वर्ष मार्च माह में गर्मी के आरंभ होते ही क्षेत्र के वनों में अग्निकांड होने लगते है जो 15 जून के आसपास तक चलते है। लगभग 21000 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले समृद्ध वन क्षेत्र में जंगल , समतल और पहाड़ी क्षेत्र में स्थित है जिनमें ग्रामजन भी बसे हुए है। मार्च माह में गर्मियों के आने के साथ ही क्षेत्र की प्रसिद्ध महुआ फसल के आगमन का समय होता है जिसके लिए स्थानीय ग्रामीण जन जंगलों में सूखे पत्तों को समेटकर उनमें आग लगा देते है। ये आग सूखे पत्तों से धीरे-धीरे बढ़कर जंगल के अधिकतम क्षेत्र में फेल जाती है। पहाड़ों पर ऊंचाई तक भी ये आग चली जाती है जो पहाड़ों की पहाडों की चोटी तक पहुंच जाती है। आग लगने का ये सिलसिला चार माह तक चलता है जिसमें बड़ी संख्या में पेड़ पौधे खत्म हो जाते है। 


झाड़ियों से बुझाते है आग

आग लगने की घटना के बारे में पता चलते ही वनकर्मियों का दल आग बुझाने निकलता है तो उनके पास मात्र पानी की बोतल होती है और छोटा धारदार हथियार जिससे वे गीली टहनी काटकर आग बुझाने की कोशिश करते है। हवा का प्रवाह अचानक बढ़ जाए या उनकी और हो जाए तो उनके भी झुलसने की पूरी संभावना होती है। पूर्व में कई बार वनकर्मियों के भी झुलस जाने की घटनाएं हुई है। आग बुझाने के लिए मैदानों तक तो जाना आसान होता है किन्तु अधिकांशतः पहाड़ों पर जाकर आग बुझाना वह भी रात्रि में , वनकर्मियों के लिए खासा चुनोतिभरा हो जाता है। 

कट्ठीवाड़ा वन क्षेत्र के काछला, कोठारमवड़ा, अन्धारझिरी बीटों के साथ ही आजादनगर मार्ग पर स्थित सघन वनों में प्रतिदिन आग लगने की घटनाएं हो रही है जिससे वहां रहने वाले वन्यप्राणीयों की परेशानी बढ़ी है। उनके आवास खत्म होने से प्राकृतिक असंतुलन बढ़ा है। 

जनता की जागरूकता से ही बचाव सम्भव

जंगलों में आग अपराधीक और शरारती तत्वों के कारण ही लगती है। महुआ फसल के लिए पेड़ों के नीचे सफाई करने के लिए भी जो आग लगाते है उससे भी जंगलों में आग लगती है। ग्रामीण जनप्रतिनिधियों, ग्रामीण शिक्षित युवा, सामाजिक कार्यकर्ता ओं के साथ वे सभी जो इस क्षेत्र में निवासरत है अपने स्तर पर जागरूकता फैलाएं तभी जंगलों के इस दावानल को रोका जा सकेगा। 

तीन दिनों से रात रात भर बुझा रहे है जंगलों की आग

वन परिक्षेत्राधिकारी वाय एस बिलवाल ने बताया कि वे सोमवार से पहाड़ों में लगी आग को बुझाते आ रहे है। आग बुझाने में कभी कभी रात रात भर हो जाती है। पहाड़ों पर लगी आग बुझाने में वनकर्मियों को परेशानी आती है क्योंकि तेज हवाओं के बीच पहाड़ों की ढलान पर केवल झाड़ियों से आग बुझाना खतरों से भरा हो जाता है। 

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