आदिवासी परम्परा के अनुसार आखातीज को नववर्ष की शुरुआत

आदिवासी परंपरा अर्थात मूल परंपरा बचेगी तो दुनिया के हित में होगा 
अलीराजपुर न्यूज डेस्क।
आदिवासी परम्परा के अनुसार आखातीज को नववर्ष की शुरुआत मानी जाती हैं आदिवासी समुदाय प्रकति के मौसमी बदलाव के अनुसार समय चक्र  में सामाजिक सांस्कृतिक  गतिविधियों होती हैं आदिवासी समुदाय के विभिन्न सामाजिक संगठनों जयस , बिरसा बिग्रेड  पदाधिकारियो  श्री नितेश अलावा श्री सलाम सोलंकी श्री मुकेश रावत श्री अजय किराड़ श्री सुरेश सेमलिया श्री वीरेंद्र बघेल श्री लाल सिंह डावर श्री नीलेश डावर श्री बबलू श्री विक्रम कनेश  श्री छगन सिंह डावर श्री हितेश तोमर श्री सज्जन जमरा श्री बसन्त अजनार  श्री नवल सिंह मंडलोई आदि ने  आदिवासी नव वर्ष आखातीज देशवासी की सुभकामना दी है 

 *क्या है आखातीज नव वर्ष का महत्व आदिवासी समुदाय जानिये* 
आदिवासी परंपरा एवं मान्यता के अनुसार आखातीज का चांद जब दिखाई देता है । तब से ही नव वर्ष की शुरुआत मानी जाती है । आदिवासी समाज की परंपरा, संस्कृति, दर्शन व जीवन मूल्य प्रकृति पर आधारित है । प्रकृति मे मौसम के अनुसार बदलाव के अनुसार ही आदिवासी समाज में तीज, त्यौहार व पर्व मनाए जाते हैं । मौसम के अनुसार वाद्य यंत्र बजाए जाते हैं, मौसम के अनुसार गीत गाए जाते हैं । इसीलिए आदिवासी समाज की पहचान प्रकृति पूजक व प्रकृति रक्षक के रूप में होती है । 
जब दुनिया में घड़ी का आविष्कार नहीं हुआ तब आदिवासी समाज के लोग सूर्य और चांद की आसमान में स्थिति को देखकर समय का अनुमान लगा लेते थे । जब दुनिया में मौसम चक्र बारे में पूर्वानुमान लगाने संबंधी कोई यंत्र तंत्र नहीं बने थे । तब से आदिवासी समाज आसमान में आने वाले हैं बादलों के प्रकार से ही कितने महीने पश्चात कौन से समय और कहां पर बारिश हो सकती है यह अनुमान लगा लेता था । जंगलों में आने वाले फूलों,फलों व पत्तियों को देखकर यह अनुमान लगा लेते थे कि इस वर्ष कौन सी फसल अच्छे से होने वाली है अर्थात प्रकृति का अध्ययन इतनी सूक्ष्मता से आदिवासी समाज के लोग कर लेते थे । आदिवासी समाज का प्रकृति के साथ सानिध्य व संवादिता के कारण ही वह प्रकृति की भाषा समझता था । वह प्रकृति से उतना ही लेता था जितना कि उसकी आवश्यकता हैं। कभी प्रकृति को नुकसान पहुंचाने की भावना मन में आती ही नहीं थी । वह जल, जंगल, जमीन, हवा, चांद ,सूरज व आसमान आदि की पूजा करता हैं अर्थात यदि कोई किसी वस्तु पूजा करता है तो उसे नुकसान पहुंचाने की भावना मन में कभी नहीं आ सकती है । 

जब तक दुनिया में पूंजीवादी विचारधारा पैदा नहीं हुई ,व्यक्तिगत स्वार्थ या संग्रहण की प्रवृत्ति नहीं आई ,तब तक पर्यावरण का संतुलन अपवादों को छोड़कर अति सुंदर था । नदियों में पानी बारहमास रहता था, जंगलों में हरियाली हुआ करती थी, चिड़ियाओं के चहचहाने की आवाज सुनाई देती थी, जंगलों में तरह तरह के फूल खिले हुए देखने को मिलते थे, नाना प्रकार की जड़ी बूटियां मिलती थी । शरीर को लगने वाले आवश्यक तत्व हमें प्रकृति से ही मिल जाया करते थे । शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता जबरदस्त हुआ करती थी। कम से कम बीमारियां फैलती थी और उसका इलाज प्रकृति प्रदत्त जड़ी बूटियों से ही हो जाया करता था । लोगों के बीच में भाईचारा की भावना हुआ करती थी। सामूहिकता व सहचर्य पर आधारित जीवन हुआ करता था । किंतु आज के इस युग में जिसे विकासवाद कहते हैं, वैज्ञानिक युग कहते हैं ,जमाना आगे बढ़ चुका है ,ऐसा कहते हैं लेकिन आप स्वयं ही समीक्षा कीजिए कि हमने क्या खोया है और क्या पाया है ।

विकास के नाम पर पर्यावरण व प्रकृति का कितना विनाश किया है । सबको ज्यादा चाहिए व संग्रहण की भावना से सारे जंगल काट दिए गए ,नदिया रोक दी गई है ,जमीन को खोद दिया गया है ,आसमान में चारों और धुआं ही धुआं दिखाई देता है । समय पर बारिश नहीं होती है ,बेमौसम बारिश होती है ,सर्दी कम पड़ने लगी है, गर्मी अत्यधिक बढ़ने लगी है, बीमारियां महामारी का रूप लेने लगी है ,अस्पतालों की संख्या दिन दूनी और रात चौगुनी बढ़ रही है। अपराधों की संख्या बढ़ रही है । लोग एक दूसरे को दुश्मन समझने लगे हैं । भाईचारे व आपसी सामंजस्य नाम की चीज बची नहीं है, सहचर्य का जीवन बचा नहीं हैं। आदिवासी समाज भी विकास के इस मकड़जाल में दिग्भ्रमित हो रहा है । 

ऐसे समय व परिस्थिति में भी अपनी परंपरा को बचाए रखना अपनी संस्कृति, जीवन मूल्य व दर्शन को बचाए रखना आदिवासी समाज के लिए एक बड़ी चुनौती है। विकासवाद के प्रवर्तकों को सोचना ही पड़ेगा की प्रकृति के साथ खिलवाड़ करते हुए हम सुरक्षित नहीं रह सकते हैं और आदिवासी समाज की परंपरा, रीति रिवाज, संस्कृति व जीवन मूल्य प्रकृति की रक्षा करने में सहायक हो सकते हैं । इसलिए आदिवासी समाज के लोग अपनी संस्कृति, परंपरा, जीवन मूल्य बचाए रखें । यह हम सबके व दुनिया के हित में है । अन्य समाज के लोगों को भी आदिवासी समाज से सीखने की आवश्यकता है । उनके जीवन मूल्यों को अपनाने की आवश्यकता है ।ना कि उन्हें अलग-अलग प्रकार की परिभाषा देते हुए नकारने की आवश्यकता है । झूठे व विनाशक अहंकारों से बाहर निकल कर आने की आवश्यकता है । प्रकृति का संतुलन बना रहेगा तो हम सब का जीवन हंसी-खुशी व प्रसन्नता से भरा हुआ होगा । 
आदिवासी समाज के लोग आखातीज के चांद को देखकर नव वर्ष की शुरुआत मानते हैं । इस दिन घर परिवार के बड़े बूढ़े लोग जब चांद दिखाई देता है तब लोटे में पानी, हाथ में अनाज व करेंसी रुपैया जमीन पर रखकर पानी व अनाज प्रकृति को समर्पित करते हुए अच्छी फसल, सुख-शांति व दुनिया मे अमन चैन की कामना कामना करते हैं । एक बार पुनः नव वर्ष की हार्दिक-हार्दिक शुभकामनाएं । आदिवासी परंपरा अर्थात मूल परंपरा बचेगी तो दुनिया के हित में होगा ।
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