शरीर से मोह ही दुख का कारण है
आलीराजपुर। निप्र
असाडपुरा स्थित वृंदावन धाम में यजमान जितेन्द्र सिंह परिहार , पंकज परिहार,प्रविण परिहार व परिहार परिवार द्वारा आयोजित श्रीमद् भागवत कथा में सातवे दिवस भागवताचार्य पंडित अरूण जी शर्मा ने राजा परिक्षित श्रीकृष्ण के 1608 विवाह ,सुदामा चरित का वर्णन करते हुए कहा दुनिया ना अच्छे में साथ है ना बुरे मे हाथ है उसने तो भगवान की आनंद की लीला को चोर बताते हुए उसे माखन चोर बताया है। इसलिए कहा गया है हमे हमेशा दुनिया की परवाह किए बिना अच्छे कार्य करते रहना चाहिए। एक दिन निश्चित ही उसका प्रतिफल प्राप्त होता है।
पं श्री शर्मा ने नेनं छिन्दनि शस्त्राणी नेनं दहसि पावक ,नेनं केलश्चिंतपिद न तापो न शोभयति मारूत अर्थात् आत्मा अचर अमर है न शस्त्र काट सकता है, न अग्नि चला सकती है न धूप सुखा सकती है,न हवा उड़ा सकती है अतः आत्मा का संबंध शरीर एंव वस्त्र जैसा है। जिस प्रकार मनुष्य र्जीण वस्त्र त्यागकर नुतन वस्त्र पहनता है वैसा ही उसका शरीर से दूसरे शरीर में जाना शरीर को धारण करना है। हमारा भ्रम है कि हमने शरीर को ही अपना मान रखा है। जबकि शरीर आत्मा का वस्त्र है। शरीर से मोह ही दुख का कारण है। मोक्ष से मुक्ति ही आत्मा की मुक्ति है। इसके साथ ही चले श्याम सुंदर से मिलने सुदामा ,गाते चले मन में हरे कृष्ण रामा हरे कृष्ण रामा भजन के साथ कथा का समापन हुआ।
समिति के मीडिया प्रभारी राजेश आर वाद्येला ने बताया कि अंतिम दिवस कथा स्थल पर पंचमुखी हुनमान मंदिर महाराज घनश्याम,गौरक्षा समिति संरक्षक पं.योगेश शास्त्र,भाजपा नेता भदु भाई पचाया पहुंचकर पंडित अरूण शर्मा जी का स्वागत कर आर्शीवाद लिया। श्री पचाया ने पंडित जी द्वारा बनाई जा रही गौसेवा धाम महेश्वर हेतु 5 हजार रूपयें भी दान किए। परिहार परिवार ने परिवारजन ,समाजजन, इष्टमित्रों ,धर्मप्रेमी जनता सर्व समाज व पत्रकार बंधुओं का श्रीमद् भागवत कथा के सफल आयोजन में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सहयोग प्रदान करने के लिए आभार माना है। कथा के अंत में भण्डारा आयोजित कर वृंदाधाम से पुनः शोभायात्रा निकाली गई जिसका समापन नृसिंह मंदिर नीम चैक पर हुआ।


