आलीराजपुर जिलाः ये कैसी प्रशासनिक सर्जरी.........।

जिला बनने के 15 साल में 12 कलेक्टर बदले गए, कैसे होगा जिले का विकास.........?

3 कलेक्टर ही सिर्फ दो साल का कार्यकाल पूरा कर सके

आशुतोष पंचोली

आलीराजपुर न्यूज। ब्यूरो चीफ

पश्चिमी मप्र के आदिवासी बहुल क्षेत्र के प्रमुख झाबुआ जिले को 17 मई 2008 में जिस संकल्प शक्ति व ईच्छा भाव से विभाजित करते हुए एक नए आदिवासी जिले आलीराजपुर का गठन किया गया था उस संकल्प व भाव की परिणति इस प्रकार से दिखाई दे रही है कि जिला बनने के 15 सालों में जिले में 12 कलेक्टर बदल दिए गए। बीते सप्ताह 12 जुलाई को भोपाल से हुई विधानसभा चुनाव 2023 के पूर्व की प्रशासनिक सर्जरी में जिले के 11वें कलेक्टर राघवेंद्रसिंह तोमर का स्थानांतरण आगर मालवा जिले में कलेक्टर के पद पर हो गया और जिले के 12वें कलेक्टर के रुप में डा. अभय अरविंद बेडेकर इंदौर से अपर कलेक्टर के पद से क्रमोन्नत होकर यहां कलेक्टर के रुप में पदस्थ हुए। जिले में कलेक्टर जैसे सबसे बड़े व प्रमुख प्रशासनिक पद पर अफसरों के बार बार बदलने के इस प्रयोग से जिले का प्रशासनिक ढांचा कभी भी सुद्ढ़ नहीं हो सका और जिले का जिस ढंग से विकास होना चाहिए था वह अभी भी नहीं हो सका है। जिसे लेकर जनता कई सारे सवाल उठाए हुए खड़ी हुई है। किंतु जनप्रतिनिधि इस मामले में खामोशी ओढ़े हुए हैं।



सिर्फ 3 कलेक्टर दो साल का कार्यकाल पूरा कर सके
आलीराजपुर जिले का गठन 17 मई 2008 को किया गया था। प्रथम कलेक्टर के रुप में चंद्रशेखर बोरकर पदस्थ हुए थे। उन्हें भी मात्र 14 माह में ही यहां से हटा दिया गया था उन्हौंने जिले में अवैध धंधों पर रोकथाम के लिए कड़ी कार्रवाईयां करना आरंभ कर दी थी। फलस्वरुप उन्हें यहां डिंडोरी जिले के कलेक्टर पद पर भेज दिया गया था। उसके बाद आए अशोक देशवाल भी 23 माह में विदा हो गए। देशवाल जी के बाद पुष्पलतासिंह मैडम आई और उन्हें 18 माह में ही हटा दिया गया। फिर आए राजेंद्रसिंह तो 14 माह में ही हटा दिए गए। फिर एनपी डेहरिया को यहां पदस्थ किया गया वे भी 17 माह में ही हटाए गए।



शेखर वर्मा सर का 28 माह का सबसे लंबा रहा कार्यकाल
 फिर साल 2014 में आए शेखर वर्मा । वे ऐसे प्रथम कलेक्टर रहे जो कि करीब जिले ढाई साल तक कलेक्टर रहे और प्रथम कलेक्टर बोरकर के बाद उनका कार्यकाल ही उल्लेखनीय व यादगार रहा। उनके 28 माह के कार्यकाल के दौरान उन्हौंने प्रशासन चलाने के साथ जिले में सामाजिक प्रशासन चलाने का भी कार्य किया और कई दीन दुखियारों, मरीजों व जरुरत मंदों तक शासन की योजनाओं का लाभ सही ढंग से पहंुचाया। उनके पश्चात आए गणेशशंकर मिश्रा का कार्यकाल भी 25 माह का तक रहा। उनके बाद आए कलेक्टर शमीमुद्दीन तो सिर्फ 7 माह तक ही कलेक्टर रहे। फिर जिले की दूसरी महिला कलेक्टर के रुप में सुरभि गुप्ता मैडम पदस्थ हुई जिन्हौंने दो साल पूरे किए। उसके बाद साल 9 सितंबर 2021 पदस्थ हुए कलेक्टर मनोज पुष्प तो मात्र 6 माह भी पूरे नही कर पाए और उनका स्थानांतरण रीवा कलेक्टर पद पर हो गया। फिर 11 वें कलेक्टर के रुप में पदस्थ हुए राघवेंद्रसिंह तोमर भी मात्र 17 माह में ही बदल दिए गए और 12 जुलाई को 12वें कलेक्टर के रुप में डा अभय बेडेकर पदस्थ हुए है अब यह देखना गौरतलब होगा कि ये कितने दिनों का कार्यकाल यहां पर पूरा कर पाते है।

जनप्रतिनिधियों के पास भी नहीं है इसका जवाब
जिले में बार बार क्यों कलेक्टर बदले गए इसका जवाब जिले के प्रमुख जनप्रतिनिधियों के पास भी नहीं है। भाजपा व कांग्रेस दोनों दलों के जनप्रतिनिधी जिला बनने के बाद से चुने गए है किंतु दोनों ही दलों की सरकार में कलेक्टर बदले गए है इसके लिए कोई एक दल भी जिम्मेदार नहीं है हालांकि 2018 से मार्च 2020 तक कांग्रेस सरकार का शासन रहा इस अवधि में भी दो कलेक्टर बदले गए बाकि का करीब साढ़े तेरह साल के भाजपा शासन में भी कलेक्टर निरंतर बदले ही गए है। वरिष्ठ व गणमान्य नागरिकों की चर्चाओं में अक्सर यह मुद्दा छाया रहता है कि जनप्रतिनिधियों के दबाव के चलते सरकार ने कलेक्टर बदले है जिसके चलते जिले का जिस ढंग से विकास होना चाहिए था वह नहीं हो पाया है। हालांकि अन्य कई सारी उपलब्धियां जिले के खाते में दर्ज है जिनका क्रियान्वयन भाजपा सरकार के दौरान हुआ है। जिसमें फाटा डेम से आलीराजपुर तक की पाईप लाईप, नर्मदा उद्वहन सिंचाई योजना जो कि पूरी होने वाली है, नया कलेक्टर भवन अन्य कई योजनाएं भी शामिल है किंतु ये उपलब्धियों उंगलियों पर गिनी जा सके उतनी ही है। देश में निरक्षरता में सबसे पहले क्रम पर होने का दाग जिले पर लगा हुआ है, गरीबी  अशिक्षा, पलायन, उद्योग धंधों की कमी आदि कई समस्याएं अभी भी यथावत बनी हुई है।

 
जिले का विकास रुका
पहले झाबुआ जिला था तो ऐसा लगता था कि आलीराजपुर सब डीवीजन को विकास के लिए राशि नहीं मिलती थी। जिला बनाया उसके बाद अभी भी कई सारी समस्याओं से जिला ग्रस्त है। बार बार कलेक्टर बदलने से सरकारी योजनाओं का सही ढंग से क्रियान्वयन ही नहीं हो पाया और जिला अभी भी पिछड़ा हुआ है। भ्रष्टाचार चरम पर है अफसरशाही हावी है और जनता परेशान है।
- ओमप्रकाश राठौर अध्यक्ष जिला कांग्रेस कमेटी।

कलेक्टरों का स्थानांतरण होना एक प्रशासनिक व्यवस्था है यह शासन स्तर का कार्य है। कई योग्य अफसरों की आवश्यकता अन्य प्रमुख जिलों में होने से उन्हें शासन द्वारा भेजा गया। शासन की योजना के क्रियान्वयन का काम कलेक्टर व प्रशासनिक मशीनरी  का होता है जो पदस्थ रहता है वह यह कार्य करता है।
- संतोष परवाल मकू भाजपा जिलाध्यक्ष।

 

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